जाने
मन में कैसी प्रलय चलती है
सुबह से दोपहर
दोपहर से सांझ
और सांझ से आधी रात
हां
क्यूंकि आधी रात के बाद तुम मेरे पास आ ही जाते हो
अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए
और शायद मैं भी तुमको आने देती हूं!
तुम जगा कर घंटों
मेरी ज़ुल्फ़ों से खेलते रहते हो
बिल्कुल छोटे बच्चे की तरह
और मैं तुम्हें देखकर लजाती रहती हूं
परवाज़ सुनो
तुम्हारे देखने भर से ही मैं
शिथिल हो जाती हूं
मेरी देह कुछ क्रिया नहीं करती
देह तुम्हारा ही नाम जपती है बार बार
रह- रह कर मेरी मनोदशा को देखकर तुम
झठ से अपनी कसी बांहों में भर लेते हो
फिर महसूस होता है कि
तुमने अपनी बांहों में भरकर
मुझे मेरी देह से मुक्त कर दिया हो
उस वक्त प्रगाढ़ वासना में लिप्त तुम
मुझे अनन्त चुंबन देते हो
मैं फिर लजा जाती हूं
बेसुध मन ,तन और आत्मा से!
हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी के हर ख्वाहिश पर दम निकले,बहुत निकले मेरे अरमान फिर भी कम निकले...
Search This Blog
Tuesday, 14 August 2018
जाने
मनोस्थितियां
कभी कभी स्थितियों से ज्यादा
मनोस्थितियां विचलित कर देती है और इसका विचलनपन धीरे धीरे अपने ग्रास में लेता रहता है, चौबीस घंटो का ये सफ़र कभी कभी व्यर्थ सा प्रतीत होता है, इसमें ना किसी से बात करने को जी चाहता और ना किसी को सुनने का ही मन रहता है। मन की मनोस्थिति एक एक पहर व्यथित करती है जाने ये किस अवसाद की तरफ इशारा करती है!
ये विवश करती है मेरे जन्म को या यूं कहें निर्रथक जन्म को लेकर। कि आखिर मेरा जन्म किसलिए हुआ ? सिर्फ़ उम्र काटने के लिए , रिश्ते बनाने के लिए, ज़िम्मेदारी उठाने के लिए, आखिर इस जन्म का सिर्फ़ यही उद्देश्य है?
मैं अब समझ नहीं पाती या मेरी इतनी समझ है ही नहीं कि क्या करना है और क्या नहीं, खुद का होना व्यर्थ का होना लगता है, अगर जन्म पर प्रश्नचिन्ह लग जाए तब आभास होता है कि बहुत बड़ा संकट है बहुत बड़ा, इससे निकलना ज़रूरी है वरना ये निरर्थकता कहीं मेरा कर्म तो नहीं बन जाएगा?
छटपटाहटें जिंदगीभर के लिए मेरे अंदर घर ना बना ले, मैं नकारात्मकताओं की झाड़ियों सी रोज़ ही घायल रहती हूं,
देखती हूं कि दुनायवी संसार में सबकुछ आसान कर दिया है अच्छाई और बुराई जैसी शायद कोई चीज़ नहीं बची इन दोनों के बीच की रिक्तता में अच्छा और बुरा जैसा पानी बहने लगा है? आज कुछ भी घटित होता है और उस घटित घटनाओं से भाव भी कुछ भी लिख जाता है, चारों तरफ रोशनी ही रोशनी है इतनी कि जिसका सामना मेरी सायं सी आंखें भी नहीं कर पाती है, विचारों के भ्रमजाल में मैं और मेरा अस्तित्व फंसता जा रहा है, और ये अस्तित्व निकलना नहीं चाहता, क्या कर्म और क्या कुकर्म है ऐसी मनोस्थिति में मैं खुद का भी सामना करने में असहाय सा महसूस करती हूं!
ओ मेरे प्रभु जाने तुम किस दूरी पर हो जिसे शायद मैं दिखाई नहीं दे रही, मेरी ना की जाने वाली प्रार्थनाएं सुनाई नहीं दे रही है, मैंने भी अब थककर तुम्हें पुकारना बंद कर दिया है, बस शिथिलता से खुद को शांत करने की जुगत में जूझ रही हूं! इन सबके बावजूद भी कुछ और घटित होता है उससे मेरी समझ और अशांत और शांत सी हो जाती है
प्रेम! जाने इस विषय पर आकर मेरे अंदर उत्साह का ऐसा संचार होता है जिसमें सही और ग़लत जैसा कुछ महसूस नहीं हो पाता क्षणिक तुम्हारा स्पर्श चरम स्पर्श मेरा रोम रोम खोल देता है फिर दूसरे ही पल मेरा रोम रोम छिन्न भिन्न सा महसूस होने लगता है। वाकई मैं नहीं जानती प्रेम करने के क्या मायने होते है, मैं नहीं जानती प्रेम में क्या विवशताएं और क्या आज़ादी होती है, मैं नहीं जानती प्रेम की शुरुआत और प्रेम की चरमसीमा क्या होती है, मैं नहीं जानती कि प्रेम की संपूर्णता किसमें और किस इंसान में होती है, मैं नहीं जानती कि इसका भटकाव का खात्मा किस धुरी पर जाकर होता है, जानती हूं तो सिर्फ़ इतना कि प्रेम बस प्रेम होता है, प्रेम कोई विश्लेषण नहीं, प्रेम कोई कयास नहीं होता, लेकिन ये मन और मन की मनोस्थिति के बीच मैं फांस सा महसूस करती हूं जिसकी चुभन मुझे अडिगता प्रदान नहीं करने दे रही है, मैं डूब भी रही हूं और उभर भी रही हूं पर एक अटलता ,स्थिरता नहीं ला पा रही इस मायारूपी जीवन में!
व्याकुलताएं लौट लौट आती है, और विचार बदल बदल जाते है, मन में ग्लानि तो नहीं लेकिन इसमें कुछ समझ नहीं आता
क्या ये सिर्फ़ विलासिता है? क्या दोनों के सपने का असर है जिसमें तुम और मैं सिर्फ़ एक दूसरे को धारण करने की कोशिश करते है? और कुछ नहीं
तुम संभोग और मैं प्रेम की तरफ अग्रसर होते है, हम लंबे वक्त में भी एक पल के लिए एक दूसरे को धारण करने का विचार कर लेते है! उसमें तुम और मैं अलग अलग नहीं एक होते है तुम्हारे और मेरे हाथ,तुम्हारे पैर और मेरे पैर, तुम्हारा जिस्म और मेरा जिस्म, तुम्हारी उत्तेजना और मेरी उत्तेजना, तुम्हारा जिस्म और मेरा जिस्म, तुम्हारी छाती और मेरी छाती, तुम्हारा मन और मेरा मन पर आत्मा आत्मा इसका मिलन इसका वरण आखिर क्यूं असफल हो जाता है? मैं तुम्हारे पास आते आते ,तुममें समाते समाते कहां चली जाती हूं? मेरी मनोस्थिति आखिर क्यूं नहीं साथ देती और मैं सायं सायं सी हूंकने लगती हूं ,मैं खोजने लगती हूं संभोग में भी तुममें अपने लिए प्रेम, सोचने लगती हूं उन भगवानों को जिनकी भार्या रहती हैं सदा उनकी बायीं तरफ, इसमें (#अग्नि से सीता तक की लाइन योगेश्वर सर की ली)जैसे अग्नि के साथ स्वाहा,कामदेव के साथ रति, शिव के साथ पार्वती, विष्णु के साथ लक्ष्मी, राम के साथ सीता!
इतना सोचते ही हो जाती हूं तुमसे और तुम्हारे जिस्म से दूर, लेकिन दूर होने भर से मेरी आसक्ति तुममें बनी रहती है, और वापस विचरनें लगती हूं अपनी मनोस्थितियों में।
Monday, 13 August 2018
कमरा
मैं देखती हूं उस कमरे को जिस पर लगा है बरसों से ताला आज मन में आया कि इस ताले को कुछ देर आराम दिया जाए, मैंने ताले को खोलकर दरवाज़े को धक्का दिया और देखा ,उस कमरे को जिसमें एक बैड है उस पर अबतक चादर बिछी हुई है, और हां कोई सिलवट भी नहीं, एक अलमारी भी है जिस पर आईना लगा हुआ है, आईना साफ़ नहीं है धुंधला चुका है धूल से, कमरे में पुराने गानों की गुनगुनाहट नहीं होती अब सायं सायं की आवाज़ें गूंजती है, दीमकें खा रही है धीरे धीरे फर्नीचर,
हां एक सोफ़ा भी है जिस पर मैं अक्सर गुस्सा होकर बैठ जाया करती थी और कहती थी गुस्से में कि मैं नहीं सिखला सकती हूं कि प्रेम कैसे होता है?और ना ही बतला सकती हूं कि प्रेम आखिर होता क्या है, प्रेम का उत्सव कैसे मनाया जाता है, बस लगता था कि प्रेम क्या, कैसे और मनाने के बीच की एक डोर है, जिसने बांध रखा है हम लोगों को।
मैं फिर देखती हूं उस कमरे में रखी हर छोटी छोटी चीज़ को जिनका साथ सदियों से तुम्हारे साथ चला आ रहा हो, पुरानी डायरी,पुराने पेन जिसकी इंक लगभग ख़त्म हो चुकी हो, आईना, फर्नीचर, अलमारी में टंगे हैंगर, ये सब, ये सब तुम्हारे साथ पहले भी थे और अब भी, इनका साथ बिल्कुल वैसा ही रहा जैसे एक हाथ का दूसरे हाथ का साथ, ये बोल नहीं सकते, पर साथ निभा जाते है, और मैं! बस मैं ही रही, मेरी दस्तक से ये सब कुछ देर के लिए सकपकाए असहज ज़रूर हुए पर फिर सब सहजता में बदल गया।जाने मैं से हम कब बन गए ये तो हममें से किसी को भी नहीं मालूम!
तुम्हारा जाना! अचानक से जाना! उफ्फ विचलित होने के साथ आजीवन के लिए मुझे और इन सबको तन्हा छोड़ गया, देखो! अब तुम भी देखो इस कमरे में मौजूद हो पर इन सबकी तरह बोल नहीं पाते, तुम्हारी आहटें जाने कब से नहीं सुनी, तुम्हारी आवाज़, तुम्हारा स्पर्श, तुम्हारी देह की गंध ये सब स्मृति में बंद है, मेरी हिम्मत नहीं होती इस कमरे में आने की पर ,पर मैं क्या करूँ ये कमरा कमरा नहीं खाईं है प्रेम की जिसमें हम दोनों डूबे रहे,साथ ही ये सब भी ,देखो ना!
अब तुम भी इस कमरे में मौजूद हो बैड के पास रखी मुस्कुराती फोटो में!
शेष फिर!
Sunday, 22 July 2018
लौट आयोगे
बहुत दर्दनाक होते है वो दिन जो ढलकर भी नहीं ढलते,जिनके घाव के दाग़ कभी न कभी दिख ही जाते है।
पता नहीं मेरा बोलना कहा तक ठीक है ये, कि अब हम दोनों में मैं की दीवार खड़ी हो चुकी है तुम दूर जा रहे हो धुंधले होते जा रहे और तुम्हारी सोच भी धुंधली हो रही है मेरे प्रति,अब तुम्हारा मेरे साथ रहना बिल्कुल वैसा ही है जैसे आग और पानी का साथ। आग और पानी कभी एक नहीं हो सकते। जब आग तब पानी नहीं और जब पानी तब आग नहीं।
मेरा दिमाग तुमको लेकर कोई ख्वाब नहीं बुनता लेकिन ये दिल बिखरे ख्वाबों को रोज़ अपने आसुओं से सिलता है, और ये सिलते ख्वाब तुमको दिखते नहीं क्यूंकि तुम अपनी बनाई बेफ्रिकी में जिये जा रहे हो, अब तुम अंजान हो गए हो, अजनबी बन गए हो, और मैं हूँ कि ना बेफ्रिकी में ही जी पाती और ना अजनबी ही हो पाती हूँ,
क्या तुम इतने खास हो?
अपने अंदर दिल के सिले कोने में मोहब्बत की मौत का जश्न मनता है पर सच कहूँ ये जश्न इक क्षण भर के लिए भी सुकून पैदा नहीं करता बस पैदा करता है तो छटपटाहट। कई दफ़ा ऐसा हुआ कि मैंने खुद को दुतकारा, तुम पर मन ने तंज कसे पर ये सब कोई असर नहीं कर सकी और मैं मोहब्बत के दलदल में फंसती चली गई।
बहुत आवाज़ें दी पहले मन ने,आत्मा ने, जुब़ान ने पर तुमने सुना सिर्फ़ सुना, तुमने दलदल से निकाला नहीं, कई संदेशों की पोटली भिजवाई इन हवाओं, सूरज, चांद, बारिशों के माध्यम से
बदले में तुमने ख़ामोशी,अहम, दोषों की फेहरिस्त भेज दी
सुन्न खड़ी मैं मोहब्बत में मैली हो जाने के बाद भी, बाट देखती हूँ, कि एक दिन तुम ज़रूर लौट आयोगे!
विभा परमार
जाने क्यूं
तुम्हारे हिस्से तुम तो आ गए
मगर
मेरे हिस्से में मैं ना आ सकी
जाने क्यूँ!
सोचती हूँ कि
तुम्हारे प्रेम की धूल ने मुझे तो ढक दिया पर शायद ये तुम्हें ना ढक सकी
तुमने
इसे वक्त रहते झाड़ दिया
अपनी विवशताओं के चलते
तुम्हारा यूं ही झाड़ना
मुझे खुद से अलग करना ही तो था
ये अलगाव की रेखा
मेरे लिए बिल्कुल वैसी ही है
जैसे शरीर के एक अंग का कट जाना
पर तुम्हारे लिए तो
ये आज़ादी हैना!
विभा परमार
बाकी रह जाता है
कितना कुछ बाकी रह जाता है कहने को,
कितना कुछ बाकी रह जाता है सुनने को
क्या तुम्हें ये सब कुछ भ्रम या क्षणभंगुर लगता है?
कितनी आसानी से तुमने अपनी बात कहकर ख़त्म कर दी वैसे ही बिल्कुल जैसे बिन पानी के फूल मुरझा जाते है,उन फूलों का मुरझाना महज़ मुरझाना नहीं होता है उनकी धीरे धीरे खूबसूरती का खत्म होना, उनका तड़पना, उनका इन्तज़ार करना कुछ ऐसा ही हुआ प्रेम के साथ जो बेइंतहा खूबसूरत, बेहिसाब इश्क करना और फिर चंद शब्दों की आड़ लेकर सबकुछ खत्म कर देना!
अजीब होता है और हैरानगी भरा भी कि प्रेम में पहले दो से एक हो जाना फिर एक होकर अलग होना ,बड़ा कष्टदायक होता है, ऐसा लगता है ये कष्ट पूरे शरीर में बह रहा हो और आत्मा घायल पड़ी हो, जिसके घाव सिर्फ़ सहने वालो को पता होते है! धीरे धीरे वक्त की धारा में हम बहते ज़रूर है, हम वो हर काम करते है जिससे हमें खुशी मिलती हो मगर तसल्ली नहीं, तसल्ली तो कबसे बेचैन पड़ी है दिल के इक कोने में जिसमें ज़मी है धूल हमारे अभिमान, मय, गलतफहमी की और हम इसको कभी दूर करने की कोशिश भी नहीं करते
क्यूँ आखिर क्यूँ ?
हमें रोना मंज़ूर होता है, हमें अकेले रहना मंज़ूर होता है, हमें खुद को सही ठहराना मंज़ूर होता है मगर दो मिनट शांति से बात करना मंज़ूर नहीं होता है
उसी कोने में यादों के कण ठिठुरते रहते है कभी कभी हम नकार देते है महज़ इन्हे बेफिज़ूल की बंदिशे कहकर!
सच में अगर ये सच्चाई है प्रेम की तो इससे अच्छे भ्रम है,इससे अच्छे ख्वाब है
जो होते ज़रूर क्षणिक है मगर आहत नहीं करते, जिनके टूटने से दर्द नहीं होता और मुस्कुराकर इनको साझा करते है
पर उनका क्या
जो होकर भी साथ नहीं होते, बस अपनी बात कहकर अपना एक काम ख़त्म कर देते है सिर्फ़ काम!
विभा परमार
Tuesday, 10 July 2018
प्रेम बहरूपियापन
प्रेम
बहरूपियापन से कम नहीं
प्रेम के अनेकों रूप
बेचैनी
छटपटाहट
आशा
निराशा
आकर्षण
मौन
खनकती हँसी!
जो बयां कर देती है
सबकुछ
तुम्हारा मेरे अंदर रोज़ बढ़ना
और
मेरे अंदर मेरा ही
कम हो जाना
सोचती हूँ
मैं इस युद्ध में अकेली तो नहीं
ऐसे कितने दिल होंगे
जो बिखरे, टूटे और फिर संभले
मगर इनकी घटनाएँ सदियों पीछा करती है
बहरूपिया बनकर!
ये जो सब घटित हो रहा है
वो ना दुर्भाग्यपूर्ण है
और ना ही सौभाग्यपूर्ण ही है
इसमें ना तो तुम्हारा बस चलता और ना ही मेरा
जानते हो
ये प्रेम जो है वो
महीन और रेशमी धागा है
अगर एक बार उलझ जाए
तो इसका सुलझना मुश्किल रहता है
कुछ तुम भी ऐसे ही हो
महीन और रेशमी धागा
मगर तुम निकले तेज़धार के
जो खुद को सुलझाकर
चले गए
अपने स्वामित्व को पाने!
और मैं ठहरी रही चट्टान सी
जो ना अब पिघलती है और ना ही कोई प्रतिक्रिया करती है
बस अंदर ही अंदर चलता है कारवां
प्रेम और प्रार्थनाओं का!
विभा परमार "विधा"
ख़ामोशी बसर करती रही
कभी कभी याद आती है
वो बातें, वो शामें
जिसमें
इक ख़ामोशी बसर करती रही
लगा था कि
ख़ामोशी मुसाफिर है चंद दिनों की
पर लगता है अब
इसने अपना बसेरा यहीं बना लिया है
ये जो
ख़ामोशी का बसेरा हैना
याद दिलाता है
अपना वो वक्त
जिसमें सिर्फ़ और सिर्फ़
हम दोनों ही मौजूद रहे!
अब अकेले रहना मुश्किल नहीं पड़ता
क्यूँ कि
ये रातें और ये दिन
पसरे हुए से लगते है
इन पसरे हुए रात और दिन में भी
मैं
तुम्हारे ख्यालों से जी उठती हूँ
जिसमें तुम्हारी उँगलियों की पोर का
मेरी गर्दन पर वो स्पर्श
सिर्फ़ मेरी देह में झनझनाहट नहीं
बल्कि मेरी आत्मा तक में शोर मचा देता है
अच्छा सुनो
इश्क का ये शोर
तुमको भी सुनाई देता है?
विभा परमार
Monday, 9 July 2018
गली
मैं खोजते खोजते
वहां वहां भटकती रही
जहां तुम मुझे मिलने का बोलते थे
वो नदी, वो नहर और
और वो किनारा
जहां तुम ही तुम रहते थे
और शायद
मैं भी!
मगर
अब तुमने
खुद को बनाकर
मुझसे ही किनारा कर लिया!
क्या करूँ मैं ऐसा
या क्या कर जाऊं ऐसा
जिससे तुम मिल सको
फिर से वहीं
तुमने मुझे अपनी
लंबी सड़क नहीं
इक गली बना दिया
जिस पर से ना जाने
कितने मुसाफिरों का रोज़ आवागमन रहता है
पर ये गली (मैं)
हमेशा तुममें ही रहती है
करती है इन्तज़ार
हर पहर
कि कभी भूले भटके ही सही
आ जाओगे तुम
एक दिन
विभा परमार "विधा"
छिटकना
1.अपनी जिंदगी से ऐसे छिटक देते हो तुम
मानों मैं रात में बिछाई गई चादर की सिलवट हूं
हैना!
2. सब बोलती हूँ बस वो नहीं बोल पाती जो चलता है
मेरे अंतर्मन में
जैसे समय चलता है
जैसे तुम चलते हो मेरे मन में
3.सवाल- जवाब
तर्क- कुतर्क
रूठना- मनाना
ये सब साथी है एक दूसरे के
दोनों में कोई
कम या ज्यादा नहीं
पर यहां!
तुम मैं
और
मैं , मैं क्यूं?
क्या दोनों
मैं से हम
"हम"
नहीं हो सकते!
4.ज्यादा पढ़ा नहीं
बस महसूस किया
कि प्रेम बंदिश में नहीं
विश्वास में ठहरता है
5.बह जाता हूं अक्सर मैं
प्रेम बहाव में इस क़दर कि
इनकी क्षणिकताओं को ही
जीवन समझ बैठता हूँ!
विभा परमार "विधा"